मूर्तियों में जान फूंकने वाले रमेश व गणेश प्रजापति की कहानी,उन्हीं की जुबानी।

मूर्तियों में जान फूंकने वाले रमेश व गणेश प्रजापति की कहानी,उन्हीं की जुबानी।
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सिल्ली से सुमित रंजन के साथ दीपक कुमार की खास रिपोर्ट।

मूर्तियों में जान फूंकने वाले रमेश व गणेश प्रजापति की कहानी,उन्हीं की जुबानी।

सिल्ली:- बाबू इन मूर्तियों को हम बड़ा पवित्र मन से बनाते हैं। इन मूर्तियों में सिर्फ मेहनत नहीं हमारा विश्वास और आस्था छिपी है। यह कहना है सिल्ली प्रखंड अंतर्गत बंता गांव के शिल्पकार रमेश व गणेश नामक दो भाईयों का। दोनों भाईयों का पूरा नाम है रमेश प्रजापति व गणेश प्रजापति। ये दोनों भाई मूर्तियों को सुंदर आकृति देने तथा मनमोहक बनाने में माहिर हैं। अद्भुत कारीगरी से प्रभावित होकर दूर दराज के व्यापारी सिल्ली के छोटे से गांव बंता खींचे चले चले आते हैं।


रमेश प्रजापति ने बताया कि वे विशेष कर दीपावली त्यौहार पर हर घर में पूजे जाने वाली मूर्तियां गणेश – लक्ष्मी तथा आकर्षक दीप के साथ मां सरस्वती की मूर्तियां बनाते हैं। मेरे काम में मेरा छोटा भाई गणेश प्रजापति भी पूरी लगन से काम में हाथ बंटाता है। श्री प्रजापति ने बताया कि दीपावली के बाद एक दो माह फुर्सत रहता है । उसके बाद दस माह काम लगातार चलता है। 30 से 40 कामगार भी मूर्तियां तैयार करने सेवा देते हैं।‌ उन्होंने कहा कि वर्ष 1981 में मौसा जी सानिध्य में मूर्ति बनाने की कला सीखें। पढ़ाई के साथ मूर्तियां बनाते थे। धीरे-धीरे काम जोर पकड़ लिया। पांकी मिट्टी ट्रेक्टर से मंगाते हैं। जब मिट्टी का अभाव हो जाता है तो बेहतर गंगा मिट्टी बंगाल से मंगाते हैं।

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मूर्तियों की रंगाई , साजों सज्जा, स्टोन , सितारा आदि समान कोलकाता से मंगाते हैं। वहीं मूर्तियां खरीदने के लिए व्यापारी झारखंड समेत ओड़िशा, पश्चिम बंगाल, बिहार , छत्तीसगढ़, दिल्ली तक से आते हैं। हम क्वालिटी प्रोडक्ट बनाते हैं यही कारण है कि दूर दराज से खरीदार आते हैं। यह पूछे जाने पर कि सरकार से कोई मदद मिली है ? उन्होंने कहा कि नहीं? प्रजापति कहते हैं हम माटी के लोग हैं , माटी की मूर्तियां बनाते हैं । पर्यावरण के अनुकूल, आस्था और विश्वास के साथ बनाई गई इन मूर्तियों के साथ हमारा भावनात्मक लगाव है।

आप भले यकिन न करें पर यह सच है कि हम इन मूर्तियों से बातें करते हैं। दिन रात इन मूर्तियों के साथ रहते – रहते गहरा लगाव हो गया है। हर रोज मूर्तियों को निहारते हैं मूर्तियों को देखकर तरह – तरह के भाव मन में उत्पन्न होते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार लोन आदि सहायता उपलब्ध कराएं तो यह कला आगे चल पाएगी। वरना आने वाली पीढ़ी इससे कला से कन्नी काट लेगी।

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